निबंध- स्त्री विमर्श (“Feminism) Explained: Powerful Quotes and Meaningful Statements on Women Empowerment”
निबंध
UPPCS, RO/ARO, BPSC MAINS
स्त्री विमर्श
तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गांठे खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास ?
...........
अगर नहीं,
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में ....?
निर्मला पुतुल (संथाली कवयित्री)
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आंचल में है दूध और आंखों में पानी।
मैथिलीशरण गुप्त
कत विधि सृजी नारि जग माहीं।
पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं।'
तुलसीदास
"सुनो द्रौपदी! शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएंगे।
कब तक आस लगाओगी तुम, बिके हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो, दुःशासन दरबारों से?"
पुष्यमित्र उपाध्याय
सजग ,सचेत ,सबल, समर्थ आधुनिक युग की नई है ।
मत मानो अब अबला उसको सक्षम है, बलधारी है।।
ऋग्वेद के अनुसार किसी पदार्थ के द्वि-अर्धांश की भांति स्त्री व पुरुष बराबर हैं ।
उपनिषदों में वर्णन है कि हमारी व्यक्तिगत आत्मा ना तो पुरुष ना ही स्त्री।
समाज के सर्वांगीण विकास हेतु महिलाओं का सशक्त होना सर्वाधिक आवश्यक है इसी संदर्भ में हम पर्यावरण स्त्रीवाद (इकोफेमिनिज्म) की बात कर सकते हैं जिसे फ्रांसिस दि इबोन द्वारा प्रतिपादित किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार माना गया है कि महिला की आत्मिक चेतना प्रकृति से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है यदि हम महिलाओं के व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगे तो अप्रत्यक्ष रूप से हम पर्यावरण संकट भी पैदा करेंगे। नर्मदा बचाओ आंदोलन ,चिपको आंदोलन आदि का महिलाओं द्वारा सफलतापूर्वक संचालन किया जाना कोई अनायास घटना नहीं है।
इतिहास में महिलाओं का योगदान
श्रद्धा, कमायनी ,इंद्राणी ,आपला, घोषा, लोपमुद्रा द्वारा वैदिक मंत्रों की रचना।
हड़प्पा संस्कृति, ऋग्वैदिक काल, सातवाहन राजवंश में विशेष स्थान।
रजिया सुल्तान ,नायिका देवी ( मोहम्मद गौरी 1178 में पराजित किया)
1857 में लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई ,उदा देवी, हजरत महल।
स्वतंत्रता आंदोलन में सरोजिनी नायडू ,सुचिता कृपलानी, अमृत कौर।
आधुनिक युग में इंदिरा गांधी, द्रोपदी मुर्मू ,लता मंगेशकर,मैरी कॉम, बछेंद्री पाल, गीता गोपीनाथ (अर्थशास्त्री), अमृता प्रीतम(लेखिका), टेसी थामस(मिसाइल वूमेन)।
किसी राष्ट्र की स्थिति का अनुमान वहां की महिलाओं की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है ।
अंबेडकर
बिना महिलाओं की स्थिति में सुधार किये इस समाज का कल्याण संभव नहीं है जैसे किसी पक्षी के लिए एक पॅंख से उड़ाना संभव नहीं है
स्वामी विवेकानंद
विभिन्न दार्शनिकों के स्त्री विरोधी विचार
नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग।
कबिरा तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग।
कबीर
प्लेटो ,अरस्तु, डेकार्ड जैसे दार्शनिकों ने स्त्री को परिवार ,प्रजनन तथा मातृत्व के साथ जोड़कर उसके अस्तित्त्व को पराश्रित व संकुचित कर दिया । जर्मन दार्शनिक हीगल ने महिलाओं और पुरुषों की दो अलग-अलग दुनिया का ही निर्माण कर डाला जिसमें महिलाओं हेतु प्राइवेट स्पीहियर तथा पुरुषों में पब्लिक स्पीहियर निश्चित किया। रूसो जैसे चिंतक स्त्री को बौद्धिक गतिविधि योग्य नहीं मानते।
स्त्री अधिकारों का समर्थन करने वाले विचारक
जॉन स्टुअर्ट मिल, जेम्स स्टर्बा, साइमन द बउओर जैसे चिंतकों ने पूर्ण लैंगिक समानता की बात कही । बउओर ने द सेकंड सेक्स पुस्तक में लिखा कि "स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि समाज द्वारा बनाई जाती है!" यह वाक्य उस पूरी संरचना की ओर इशारा था जहां संस्थागत रूप से स्त्रियों को कमतर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया चल रही थी । हीगल के दो दुनियाओं के निर्धारण का खंडन करते हुए जेम्स स्टर्बा ने स्त्री- पुरुष के सह-अस्तित्व पर जोर दिया।
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