निबंध : शहरीकरण बनाम पर्यावरणीय संतुलन " शोर यूँ ही न परिंदों ने मचाया होगा कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा, पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा." भारत के प्रगतिशील उर्दू शायर कैफ़ी आज़मी साहब की यह पंक्तियां पर्यावरण और तथाकथित विकास के बीच अंतर संबंधों को दर्शाती हैं l हैदराबाद के पास 400 एकड़ में फैले कांचा गचीबावली जंगल है, जहां सरकार इस जमीन का IT and Infrastructure development के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैl ऐसे में जब इस जंगल की कटाई के लिए बड़ी-बड़ी मशीन लगाई गई तो वहां के पशु पक्षियों ने इतना तीव्र शंखनाद किया की कांचा गचीबावली जंगल के आसपास रिहायशी बस्तियों + हैदराबाद विश्वविद्यालय के कैंपस का ध्वनि तीव्रता 70Db पार कर गया और स्थानीय लोग एवं hyderabad University के विद्यार्थी आकर जंगल को बचाने के लिए आंदोलन करने लगे और पर्यावरण/जंगल बचाने के लिए अभी भी संघर्षशील है l देश का शहरीकरण जिस तेजी से हो रहा, उससे तो यही लगता है कि बहुत जल्दी ही कंक्रीट के जंगल, लकड...
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